Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 16.8 / 24

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)16.8

16.8
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् । अपरस्परसम्भूतमकिंचत्कमहेतुकम् ॥ १६-८ ॥
asatyamapratiṣṭhaṃ te jagadāhuranīśvaram | aparasparasambhūtamakiṃcatkamahetukam || 16-8 ||
— सत्य-रहित, प्रतिष्ठा-रहित वे ; — जगत् को ईश्वर-रहित कहते हैं ; — परस्पर (काम से) उत्पन्न ; — अकिञ्चित्क (निष्प्रयोजन), हेतुरहित

वे कहते हैं कि जगत् सत्य-रहित, प्रतिष्ठा-रहित और ईश्वर-रहित है; यह परस्पर (काम से) उत्पन्न है, अन्य कोई प्रयोजन नहीं, और हेतुरहित है।