Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 16.15 / 24

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)16.15

16.15
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया । यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्ये इत्यज्ञानविमोहिताः ॥ १६-१५ ॥
āḍhyo'bhijanavānasmi ko'nyo'sti sadṛśo mayā | yakṣye dāsyāmi modiṣye ityajñānavimohitāḥ || 16-15 ||
— मैं धनवान् और कुलीन हूँ ; — मेरे समान दूसरा कौन है ; — मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, आनन्द करूँगा ; — इस प्रकार अज्ञान से मोहित

'मैं धनवान् और कुलीन हूँ, मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, आनन्द करूँगा' — इस प्रकार अज्ञान से मोहित।