Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 16.14 / 24

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)16.14

16.14
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि । ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी ॥ १६-१४ ॥
asau mayā hataḥ śatrurhaniṣye cāparānapi | īśvaro'hamahaṃ bhogī siddho'haṃ balavān sukhī || 16-14 ||
— वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया ; — और दूसरों को भी मारूँगा ; — मैं ईश्वर हूँ, मैं भोक्ता ; — मैं सिद्ध, बलवान्, सुखी

'वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया, और दूसरों को भी मैं मारूँगा; मैं ईश्वर हूँ, मैं भोक्ता हूँ; मैं सिद्ध, बलवान् और सुखी हूँ।'