क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥
१३-३५ ॥
kṣetrakṣetrajñayorevamantaraṃ jñānacakṣuṣā |
bhūtaprakṛtimokṣaṃ ca ye viduryānti te param ||
13-35 ||
जो इस प्रकार ज्ञान-चक्षु से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को, तथा भूतों की प्रकृति से मोक्ष को जानते हैं, वे परम (तत्त्व) को प्राप्त होते हैं।