Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 13.21 / 35

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)13.21

13.21
कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते । पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥ १३-२१ ॥
kāryakaraṇakartṛtve hetuḥ prakṛtirucyate | puruṣaḥ sukhaduḥkhānāṃ bhoktṛtve heturucyate || 13-21 ||
— कार्य और करण के कर्तृत्व में ; — प्रकृति हेतु कही जाती है ; — पुरुष, सुख-दुःख के ; — भोक्तृत्व में हेतु कहा जाता है

कार्य और करण के कर्तृत्व में प्रकृति हेतु कही जाती है; सुख और दुःख के भोक्तृत्व में पुरुष हेतु कहा जाता है।