Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 13.20 / 35

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)13.20

13.20
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि । विकाराꣳश्च गुणाꣳश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥ १३-२० ॥
prakṛtiṃ puruṣaṃ caiva viddhyanādī ubhāvapi | vikārāṁśca guṇāṁścaiva viddhi prakṛtisambhavān || 13-20 ||
— प्रकृति और पुरुष ; — दोनों को ही अनादि जान ; — और विकारों तथा गुणों को ; — प्रकृति से उत्पन्न जान

प्रकृति और पुरुष — दोनों को ही अनादि जान; और विकारों तथा गुणों को प्रकृति से उत्पन्न जान।