प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।
विकाराꣳश्च गुणाꣳश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥
१३-२० ॥
prakṛtiṃ puruṣaṃ caiva viddhyanādī ubhāvapi |
vikārāṁśca guṇāṁścaiva viddhi prakṛtisambhavān ||
13-20 ||
प्रकृति और पुरुष — दोनों को ही अनादि जान; और विकारों तथा गुणों को प्रकृति से उत्पन्न जान।