Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 13.2 / 35

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)13.2

13.2
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते । एतद्यो वेद तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ १३-२ ॥
idaṃ śarīraṃ kaunteya kṣetramityabhidhīyate | etadyo veda taṃ prāhuḥ kṣetrajña iti tadvidaḥ || 13-2 ||
— यह शरीर, हे कुन्तीपुत्र ; — 'क्षेत्र' कहलाता है ; — जो इसे जानता है उसे कहते हैं ; — 'क्षेत्रज्ञ', इसे जानने वाले

हे कुन्तीपुत्र, यह शरीर 'क्षेत्र' कहलाता है; और जो इसे जानता है, उसे जानने वाले 'क्षेत्रज्ञ' कहते हैं।