Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 13.3 / 35

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)13.3

13.3
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत । क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥ १३-३ ॥
kṣetrajñaṃ cāpi māṃ viddhi sarvakṣetreṣu bhārata | kṣetrakṣetrajñayorjñānaṃ yattajjñānaṃ mataṃ mama || 13-3 ||
— और क्षेत्रज्ञ भी मुझे जान ; — समस्त क्षेत्रों में, हे भारत ; — क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान ; — उसे मैं (यथार्थ) ज्ञान मानता हूँ

हे भारत, समस्त क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ भी मुझे ही जान; क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, उसे मैं (यथार्थ) ज्ञान मानता हूँ।