क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥
१३-३ ॥
kṣetrajñaṃ cāpi māṃ viddhi sarvakṣetreṣu bhārata |
kṣetrakṣetrajñayorjñānaṃ yattajjñānaṃ mataṃ mama ||
13-3 ||
हे भारत, समस्त क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ भी मुझे ही जान; क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, उसे मैं (यथार्थ) ज्ञान मानता हूँ।