Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 13.4 / 35

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)13.4

13.4
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् । स च यो यत्स्वभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥ १३-४ ॥
tatkṣetraṃ yacca yādṛkca yadvikāri yataśca yat | sa ca yo yatsvabhāvaśca tatsamāsena me śṛṇu || 13-4 ||
— वह क्षेत्र क्या और कैसा ; — क्या विकार, किससे, और कौन ; — और वह (क्षेत्रज्ञ) कौन, किस सामर्थ्य वाला ; — वह संक्षेप में मुझसे सुन

वह क्षेत्र क्या है और कैसा है, उसके क्या विकार हैं, किससे और कौन-से (विकार उत्पन्न होते हैं), तथा वह (क्षेत्रज्ञ) कौन है और किस सामर्थ्य वाला है — वह संक्षेप में मुझसे सुन।