Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 13.5 / 35

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)13.5

13.5
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् । ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितम् ॥ १३-५ ॥
ṛṣibhirbahudhā gītaṃ chandobhirvividhaiḥ pṛthak | brahmasūtrapadaiścaiva hetumadbhirviniścitam || 13-5 ||
— ऋषियों द्वारा अनेक प्रकार से गाया ; — विविध छन्दों द्वारा पृथक् ; — और ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा भी ; — हेतुयुक्त, भली-भाँति निश्चित

यह ऋषियों के द्वारा अनेक प्रकार से, विविध छन्दों के द्वारा पृथक्-पृथक् गाया गया है, और हेतुयुक्त ब्रह्मसूत्र के पदों के द्वारा भी भली-भाँति निश्चित किया गया है।