Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 13.17 / 35

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)13.17

13.17
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् । भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥ १३-१७ ॥
avibhaktaṃ ca bhūteṣu vibhaktamiva ca sthitam | bhūtabhartṛ ca tajjñeyaṃ grasiṣṇu prabhaviṣṇu ca || 13-17 ||
— भूतों में अविभक्त ; — फिर भी विभक्त-सा स्थित ; — वह ज्ञेय भूतों का भर्ता ; — ग्रसने वाला (संहारक) और उत्पन्न करने वाला

वह भूतों में अविभक्त है, फिर भी विभक्त-सा स्थित है; वह ज्ञेय भूतों का भर्ता (पालक), ग्रसने वाला (संहारक) और उत्पन्न करने वाला (प्रभु) है।