Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 13.18 / 35

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)13.18

13.18
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते । ज्ञानज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥ १३-१८ ॥
jyotiṣāmapi tajjyotistamasaḥ paramucyate | jñānajñeyaṃ jñānagamyaṃ hṛdi sarvasya viṣṭhitam || 13-18 ||
— वह ज्योतियों की भी ज्योति ; — अन्धकार से परे कहा जाता ; — ज्ञान, ज्ञेय, ज्ञान से प्राप्य ; — सबके हृदय में स्थित

वह ज्योतियों की भी ज्योति है, अन्धकार से परे कहा जाता है; वह ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञान से प्राप्य है, सबके हृदय में स्थित है।