Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 13.16 / 35

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)13.16

13.16
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च । सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥ १३-१६ ॥
bahirantaśca bhūtānāmacaraṃ carameva ca | sūkṣmatvāttadavijñeyaṃ dūrasthaṃ cāntike ca tat || 13-16 ||
— भूतों के बाहर और भीतर ; — अचर और चर भी ; — सूक्ष्म होने से वह अविज्ञेय ; — दूर स्थित और समीप भी

वह भूतों के बाहर और भीतर है; अचर है, और चर भी; सूक्ष्म होने के कारण वह अविज्ञेय है; वह दूर स्थित है और समीप भी।