सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥
१३-१५ ॥
sarvendriyaguṇābhāsaṃ sarvendriyavivarjitam |
asaktaṃ sarvabhṛccaiva nirguṇaṃ guṇabhoktṛ ca ||
13-15 ||
वह समस्त इन्द्रियों के गुणों के रूप में प्रतीत होता है, फिर भी समस्त इन्द्रियों से रहित है; अनासक्त है, फिर भी सब का धारक है; निर्गुण है, फिर भी गुणों का भोक्ता है।