Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 11.47 / 60

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)11.47

11.47
दिव्यानि कर्माणि तवाद्भुतानि पूर्वाणि पूर्वे ऋषयः स्मरन्ति । नान्योऽस्ति कर्ता जगतस्त्वमेको धाता विधाता च विभुर्भवश्च ॥ ११-४७ ॥
divyāni karmāṇi tavādbhutāni pūrvāṇi pūrve ṛṣayaḥ smaranti | nānyo'sti kartā jagatastvameko dhātā vidhātā ca vibhurbhavaśca || 11-47 ||
— आपके दिव्य, अद्भुत कर्मों को ; — पूर्व के ऋषि उन प्राचीन को स्मरण करते हैं ; — जगत् का अन्य कर्ता नहीं, आप अकेले ; — धाता, विधाता, विभु और उद्गम

आपके इन अद्भुत दिव्य कर्मों का पूर्वकाल के ऋषि स्मरण करते हैं; जगत् का अन्य कोई कर्ता नहीं — आप अकेले ही इसके धाता, विधाता, विभु और उद्गम हैं।