The Great Liberation Tantra· 3.25 / 153

The Great Liberation Tantra3.25

3.25
किं कुर्वन्ति ग्रहा रुष्टा वेतालाश्चेटकादयः । पिशाचा गुह्यका भूता डाकिन्यो मातृकादयः । तस्य दर्शनमात्रेण पलायन्ते पराङ्मुखाः ॥२५॥
kiṃ kurvanti grahā ruṣṭā vetālāśceṭakādayaḥ | piśācā guhyakā bhūtā ḍākinyo mātṛkādayaḥ | tasya darśanamātreṇa palāyante parāṅmukhāḥ ||25||
— क्या ; — कर सकते हैं ; — ग्रह ; — रुष्ट ; — वेताल, चेटक आदि ; — पिशाच ; — गुह्यक ; — भूत ; — डाकिनी ; — मातृका आदि ; — उसके ; — दर्शनमात्र से ; — भाग जाते हैं ; — मुँह मोड़कर

रुष्ट ग्रह, वेताल, चेटक आदि, पिशाच, गुह्यक, भूत, डाकिनी, मातृका आदि उसका क्या कर सकते हैं? उसके दर्शनमात्र से वे मुँह मोड़कर भाग जाते हैं।