The Great Liberation Tantra· 3.26 / 153

The Great Liberation Tantra3.26

3.26
रक्षितो ब्रह्ममन्त्रेण प्रावृतो ब्रह्मतेजसा । किं विभेति ग्रहादिभ्यो मार्तण्ड इव चापरः ॥२६॥
rakṣito brahmamantreṇa prāvṛto brahmatejasā | kiṃ vibheti grahādibhyo mārtaṇḍa iva cāparaḥ ||26||
— रक्षित ; — ब्रह्म-मन्त्र से ; — आवृत ; — ब्रह्म-तेज से ; — क्यों ; — डरे ; — ग्रह आदि से ; — सूर्य ; — के समान ; — और ; — दूसरा (सूर्य)

ब्रह्म-मन्त्र से रक्षित, ब्रह्म-तेज से आवृत — वह दूसरे सूर्य के समान — ग्रह आदि से भला क्यों डरे?