The Great Liberation Tantra· 3.24 / 153

The Great Liberation Tantra3.24

3.24
मन्त्रग्रहणमात्रेण देही ब्रह्ममयो भवेत् । ब्रह्मभूतस्य देवेशि किमवाप्यं जगत्त्रये ॥२४॥
mantragrahaṇamātreṇa dehī brahmamayo bhavet | brahmabhūtasya deveśi kimavāpyaṃ jagattraye ||24||
— मन्त्र के ग्रहण मात्र से ; — देही ; — ब्रह्ममय ; — हो ; — ब्रह्मभूत हुए के ; — हे देवेशि ; — क्या प्राप्तव्य ; — तीनों जगत् में

मन्त्र के ग्रहण मात्र से देही ब्रह्ममय हो जाता है; हे देवेशि, ब्रह्मभूत हुए के लिए तीनों जगत् में और क्या प्राप्तव्य रह जाता है?