The Great Liberation Tantra· 3.138 / 153

The Great Liberation Tantra3.138

3.138
तत उत्थाय गुरवे यथाशक्त्यनुसारतः । दक्षिणां स्वं फलं वाऽपि दद्यात् साधकसत्तमः । गुरोराज्ञावशीभूत्वा विहरेद्देववद् भुवि ॥१३८॥
tata utthāya gurave yathāśaktyanusārataḥ | dakṣiṇāṃ svaṃ phalaṃ vā'pi dadyāt sādhakasattamaḥ | gurorājñāvaśībhūtvā vihareddevavad bhuvi ||138||
— तदनन्तर ; — उठकर ; — गुरु को ; — अपनी शक्ति के अनुसार ; — दक्षिणा ; — अपना ; — फल (पुण्य) ; — अथवा ; — दे ; — साधकों में श्रेष्ठ ; — गुरु की आज्ञा के वश में होकर ; — पृथ्वी पर देव के समान विचरे ; — पृथ्वी पर

तदनन्तर उठकर, साधकों में श्रेष्ठ यथाशक्ति गुरु को दक्षिणा अथवा अपना (पुण्य-) फल दे; और गुरु की आज्ञा के वश में होकर पृथ्वी पर देव के समान विचरे।