उत्तिष्ठ वत्स मुक्तोऽसि ब्रह्मज्ञानपरो भव ।
जितेन्द्रियः सत्यवादी वलारोग्यं सदाऽस्तु ते ॥१३७॥
uttiṣṭha vatsa mukto'si brahmajñānaparo bhava |
jitendriyaḥ satyavādī valārogyaṃ sadā'stu te ||137||
'उठो, वत्स, तुम मुक्त हो; ब्रह्म-ज्ञान में तत्पर हो जाओ, जितेन्द्रिय और सत्यवादी (बनो); तुम्हें सदा बल और आरोग्य प्राप्त हो।'