The Great Liberation Tantra· 3.137 / 153

The Great Liberation Tantra3.137

3.137
उत्तिष्ठ वत्स मुक्तोऽसि ब्रह्मज्ञानपरो भव । जितेन्द्रियः सत्यवादी वलारोग्यं सदाऽस्तु ते ॥१३७॥
uttiṣṭha vatsa mukto'si brahmajñānaparo bhava | jitendriyaḥ satyavādī valārogyaṃ sadā'stu te ||137||
— उठो ; — हे वत्स ; — तुम मुक्त हो ; — ब्रह्म-ज्ञान में तत्पर ; — हो जाओ ; — जितेन्द्रिय ; — सत्यवादी ; — बल और आरोग्य ; — सदा हो ; — तुम्हें

'उठो, वत्स, तुम मुक्त हो; ब्रह्म-ज्ञान में तत्पर हो जाओ, जितेन्द्रिय और सत्यवादी (बनो); तुम्हें सदा बल और आरोग्य प्राप्त हो।'