The Great Liberation Tantra3.136
ततः श्रीगुरुपादाब्जे दण्डवत् पतितं शिशुम् ।
उत्थापयेद् गुरुः स्नेहादिमं मन्त्रमुदीरयन् ॥१३६॥
tataḥ śrīgurupādābje daṇḍavat patitaṃ śiśum |
utthāpayed guruḥ snehādimaṃ mantramudīrayan ||136||
— तदनन्तर ; — श्री-गुरु के चरण-कमलों में ; — दण्ड के समान ; — गिरे हुए ; — शिशु (शिष्य) को ; — उठाए ; — गुरु ; — स्नेह से ; — इस ; — मन्त्र को ; — उच्चारित करते हुए तदनन्तर गुरु, श्री-गुरु के चरण-कमलों में दण्ड के समान गिरे हुए शिष्य को स्नेह से, यह मन्त्र उच्चारित करते हुए उठाए: