विधयः किङ्करा यत्र निषेधाः प्रभवोऽपि न ।
स्वेच्छाचारेणेष्टसिद्धिस्तद्विना कोऽन्यमाश्रयेत् ॥१२७॥
vidhayaḥ kiṅkarā yatra niṣedhāḥ prabhavo'pi na |
svecchācāreṇeṣṭasiddhistadvinā ko'nyamāśrayet ||127||
जहाँ विधियाँ (उसके) किंकर हैं, और निषेध भी प्रभावी नहीं — वहाँ स्वेच्छाचार से ही अभीष्ट की सिद्धि होती है। उसके बिना और किसका आश्रय लिया जाए?