प्रातःकृत्यं प्रातरेव सन्ध्यां कुर्यात् त्रिकालतः ।
मध्याह्ने पूजनं कुर्यात् सर्वतन्त्रेष्वयं विधिः ।
परब्रह्मोपासने तु साधकेच्छाविधिः शिवे ॥१२६॥
prātaḥkṛtyaṃ prātareva sandhyāṃ kuryāt trikālataḥ |
madhyāhne pūjanaṃ kuryāt sarvatantreṣvayaṃ vidhiḥ |
parabrahmopāsane tu sādhakecchāvidhiḥ śive ||126||
प्रातः-कृत्य प्रातःकाल में ही, सन्ध्या तीनों कालों में, पूजन मध्याह्न में करे — समस्त तन्त्रों में यह विधि है; पर हे शिवे, परम ब्रह्म की उपासना में साधक की इच्छा ही विधि है।