The Great Liberation Tantra· 3.125 / 153

The Great Liberation Tantra3.125

3.125
कलौ नास्त्येव नास्त्येव सत्यं सत्यं मयोच्यते । ब्रह्मदीक्षां विना देवि कैवल्याय सुखाय च ॥१२५॥
kalau nāstyeva nāstyeva satyaṃ satyaṃ mayocyate | brahmadīkṣāṃ vinā devi kaivalyāya sukhāya ca ||125||
— कलियुग में ; — नहीं है ही ; — नहीं है ही ; — सत्य ; — सत्य ; — मेरे द्वारा कहा जाता है ; — ब्रह्म-दीक्षा को ; — बिना ; — हे देवि ; — कैवल्य के लिए ; — सुख के लिए ; — और

हे देवि, कलियुग में नहीं है, नहीं ही है — सत्य, सत्य मैं कहता हूँ — ब्रह्म-दीक्षा के बिना कैवल्य और सुख के लिए (अन्य कोई उपाय)।