The Great Liberation Tantra· 2.5 / 54

The Great Liberation Tantra2.5

2.5
यथातत्त्वं यथान्यायं यथायोग्यं न संशयः । कलिकल्मषदीनानां द्विजादीनां सुरेश्वरि ॥५॥
yathātattvaṃ yathānyāyaṃ yathāyogyaṃ na saṃśayaḥ | kalikalmaṣadīnānāṃ dvijādīnāṃ sureśvari ||5||
— यथातत्त्व ; — यथान्याय ; — यथायोग्य ; — नहीं ; — संशय ; — कलि के कल्मष से दीनों का ; — द्विज आदि का ; — हे सुरेश्वरि

हे सुरेश्वरि, (तुमने) यथातत्त्व, यथान्याय और यथायोग्य (कहा है) — इसमें कोई संशय नहीं — कलि के कल्मष से दीन हुए द्विज आदि के विषय में।