The Great Liberation Tantra· 2.48 / 54

The Great Liberation Tantra2.48

2.48
तरोर्मूलाभिषेकेण यथा तद्भुजपल्लवाः । तृप्यन्ति तदनुष्ठानात् तथा सर्वेऽमरादयः ॥४८॥
tarormūlābhiṣekeṇa yathā tadbhujapallavāḥ | tṛpyanti tadanuṣṭhānāt tathā sarve'marādayaḥ ||48||
— वृक्ष की जड़ में जल देने से ; — जैसे ; — उसकी शाखाएँ और पल्लव ; — तृप्त होते हैं ; — उसकी आराधना से ; — वैसे ही ; — सब ; — अमर आदि

जैसे वृक्ष की जड़ में जल देने से उसकी शाखाएँ और पल्लव तृप्त होते हैं, वैसे ही उसकी आराधना से समस्त अमर आदि तृप्त होते हैं।