तरोर्मूलाभिषेकेण यथा तद्भुजपल्लवाः ।
तृप्यन्ति तदनुष्ठानात् तथा सर्वेऽमरादयः ॥४८॥
tarormūlābhiṣekeṇa yathā tadbhujapallavāḥ |
tṛpyanti tadanuṣṭhānāt tathā sarve'marādayaḥ ||48||
जैसे वृक्ष की जड़ में जल देने से उसकी शाखाएँ और पल्लव तृप्त होते हैं, वैसे ही उसकी आराधना से समस्त अमर आदि तृप्त होते हैं।