तस्मिंस्तुष्टे जगत्तुष्टं प्रीणिते प्रीणितं जगत् ।
तदाराधनतो देवि सर्वेषां प्रीणनं भवेत् ॥४७॥
tasmiṃstuṣṭe jagattuṣṭaṃ prīṇite prīṇitaṃ jagat |
tadārādhanato devi sarveṣāṃ prīṇanaṃ bhavet ||47||
उसके सन्तुष्ट होने पर जगत् सन्तुष्ट होता है, उसके प्रसन्न होने पर जगत् प्रसन्न होता है। हे देवि, उसकी आराधना से सबकी प्रसन्नता होती है।