The Great Liberation Tantra· 2.47 / 54

The Great Liberation Tantra2.47

2.47
तस्मिंस्तुष्टे जगत्तुष्टं प्रीणिते प्रीणितं जगत् । तदाराधनतो देवि सर्वेषां प्रीणनं भवेत् ॥४७॥
tasmiṃstuṣṭe jagattuṣṭaṃ prīṇite prīṇitaṃ jagat | tadārādhanato devi sarveṣāṃ prīṇanaṃ bhavet ||47||
— उसके ; — सन्तुष्ट होने पर ; — जगत् ; — सन्तुष्ट ; — प्रसन्न होने पर ; — प्रसन्न ; — जगत् ; — उसकी आराधना से ; — हे देवि ; — सबकी ; — प्रसन्नता ; — होती है

उसके सन्तुष्ट होने पर जगत् सन्तुष्ट होता है, उसके प्रसन्न होने पर जगत् प्रसन्न होता है। हे देवि, उसकी आराधना से सबकी प्रसन्नता होती है।