The Great Liberation Tantra· 2.42 / 54

The Great Liberation Tantra2.42

2.42
स्वे स्वेऽधिकारे निरतास्ते शासति तदाज्ञया । त्वं परा प्रकृतिस्तस्य पूज्याऽसि भुवनत्रये ॥४२॥
sve sve'dhikāre niratāste śāsati tadājñayā | tvaṃ parā prakṛtistasya pūjyā'si bhuvanatraye ||42||
— अपने-अपने ; — अधिकार में ; — रत ; — वे ; — शासन करते हैं ; — उसकी आज्ञा से ; — तुम ; — परा ; — प्रकृति ; — उसकी ; — पूज्य ; — तुम हो ; — तीनों भुवनों में

वे अपने-अपने अधिकार में रत होकर उसकी आज्ञा से शासन करते हैं। तुम उसकी परा प्रकृति हो, तीनों भुवनों में पूज्य हो।