The Great Liberation Tantra· 2.39 / 54

The Great Liberation Tantra2.39

2.39
तत्सत्यतामुपाश्रित्य सद्वद्भाति पृथक् पृथक् । तेनैव हेतुभूतेन वयं जाता महेश्वरि ॥३९॥
tatsatyatāmupāśritya sadvadbhāti pṛthak pṛthak | tenaiva hetubhūtena vayaṃ jātā maheśvari ||39||
— उसकी सत्यता का ; — आश्रय लेकर ; — सद्-रूप ; — प्रतीत होती है ; — पृथक्-पृथक् ; — उसी (हेतु) से ; — हेतुभूत ; — हम ; — उत्पन्न हुए ; — हे महेश्वरि

हे महेश्वरि, उनकी सत्यता का आश्रय लेकर प्रत्येक वस्तु पृथक्-पृथक् सद्-रूप प्रतीत होती है; और उसी हेतुभूत (तत्त्व) से हम भी उत्पन्न हुए हैं।