तत्सत्यतामुपाश्रित्य सद्वद्भाति पृथक् पृथक् ।
तेनैव हेतुभूतेन वयं जाता महेश्वरि ॥३९॥
tatsatyatāmupāśritya sadvadbhāti pṛthak pṛthak |
tenaiva hetubhūtena vayaṃ jātā maheśvari ||39||
हे महेश्वरि, उनकी सत्यता का आश्रय लेकर प्रत्येक वस्तु पृथक्-पृथक् सद्-रूप प्रतीत होती है; और उसी हेतुभूत (तत्त्व) से हम भी उत्पन्न हुए हैं।