The Great Liberation Tantra· 1.45 / 72

The Great Liberation Tantra1.45

1.45
लोकप्रतारणार्थाय जपपूजापरायणाः । पाषण्डाः पण्डितम्मन्याः श्रद्धाभक्तिविवर्जिताः ॥४५॥
lokapratāraṇārthāya japapūjāparāyaṇāḥ | pāṣaṇḍāḥ paṇḍitammanyāḥ śraddhābhaktivivarjitāḥ ||45||
— लोगों को ठगने के लिए ; — जप-पूजा में तत्पर (दिखावे के) ; — पाखण्डी ; — स्वयं को पण्डित मानने वाले ; — श्रद्धा और भक्ति से रहित

लोगों को ठगने के लिए जप-पूजा में तत्पर, पाखण्डी, स्वयं को पण्डित मानने वाले, श्रद्धा और भक्ति से रहित होंगे।