Vijñāna Bhairava Tantra · 1.147

Vijñāna Bhairava Tantra 1.147

1.147
आधारेष्वथवाशक्त्या ज्ञानाद्वा देशकल्पनात् । उज्जाते शक्तिसंशोभे शान्ते पश्चात्तदा भवेत् ॥१४७॥
ādhāreṣv athavāśaktyā jñānād vā deśakalpanāt | ujjāte śaktisaṃśobhe śānte paścāt tadā bhavet
anuṣṭubh
— आधारों पर (अधिकरण कारक बहुवचन) ; — शक्ति-संशोभ में, शक्ति-प्रकाश में (अधिकरण — समासगत) ; — उसके बाद शान्त होने पर (अव्यय + अधिकरण कारक)

[पुनरुक्ति — श्लोक ९५] आधारों पर, या अशक्ति से, या ज्ञान से, या देश-कल्पना से जब शक्ति-संशोभ उत्पन्न हो, उसके शान्त होने पर तब (परम अवस्था) हो जाती है।