Vijñāna Bhairava Tantra · 1.148

Vijñāna Bhairava Tantra 1.148

1.148
एवमेव हि सर्वत्र भैरवो भैरवीप्रिये । सर्वत्र भावनाख्यानमुक्तं भवति शोभने ॥१४८॥
evam eva hi sarvatra bhairavo bhairavīpriye | sarvatra bhāvanākhyānam uktaṃ bhavati śobhane
anuṣṭubh
— सर्वत्र (अव्यय) ; — भावना-आख्यान, भावना-नामक उपदेश (कर्ता कारक — समासगत) ; — हे शोभने! (सम्बोधन)

हे शोभने (शोभनवती भैरवी-प्रिये)! इसी प्रकार सर्वत्र भैरव (की उपस्थिति) है — सर्वत्र भावना-नामक उपदेश (मैंने) कहा है।