Vijñāna Bhairava Tantra · 1.149

Vijñāna Bhairava Tantra 1.149

1.149
यस्य कस्यापि देहेऽस्मिन्प्रत्ययोऽहंकृतो भवेत् । तस्यैव क्षुद्रसंवित्तेर्भैरवत्वं प्रकाशते ॥१४९॥
yasya kasyāpi dehe'smin pratyayo'haṃkṛto bhavet | tasyaiva kṣudrasaṃvitter bhairavatvaṃ prakāśate
anuṣṭubh
— किसी का भी इस देह में (षष्ठी + अव्यय + अधिकरण) ; — 'मैं-हूँ' का प्रत्यय उत्पन्न हो (कर्ता + विधि लिङ् — समासगत) ; — उसी के लिए ही (षष्ठी + अव्यय) ; — क्षुद्र संवित् से (अपादान — समासगत) ; — भैरवत्व प्रकाशित होता है — कर्ता + वर्तमान काल

इस देह में जिस किसी का भी अहं-कृत प्रत्यय (मैं-हूँ की प्रतीति) उत्पन्न होता है — उसी क्षुद्र (सीमित) संवित् से (भी) भैरवत्व (परम स्वरूप) प्रकाशित होता है।