— किसी का भी इस देह में (षष्ठी + अव्यय + अधिकरण); — 'मैं-हूँ' का प्रत्यय उत्पन्न हो (कर्ता + विधि लिङ् — समासगत); — उसी के लिए ही (षष्ठी + अव्यय); — क्षुद्र संवित् से (अपादान — समासगत); — भैरवत्व प्रकाशित होता है — कर्ता + वर्तमान काल
इस देह में जिस किसी का भी अहं-कृत प्रत्यय (मैं-हूँ की प्रतीति) उत्पन्न होता है — उसी क्षुद्र (सीमित) संवित् से (भी) भैरवत्व (परम स्वरूप) प्रकाशित होता है।