Vijñāna Bhairava Tantra · 1.146

Vijñāna Bhairava Tantra 1.146

1.146
भ्रान्त्वा भ्रान्त्वा शरीरेण त्वरितं भुवि पातनात् । क्षोभशक्तिविरामेण परा संजायते दशा ॥१४६॥
bhrāntvā bhrāntvā śarīreṇa tvaritaṃ bhuvi pātanāt | kṣobhaśaktivirāmeṇa parā saṃjāyate daśā
anuṣṭubh
— बार-बार चक्कर खाकर (पुनरुक्त क्त्वान्त) ; — क्षोभ-शक्ति के विश्राम से (करण — समासगत) ; — परा दशा, परम अवस्था (कर्ता कारक)

[पुनरुक्ति — श्लोक ९४] शरीर से बार-बार चक्कर खाकर शीघ्र भूमि पर गिरने से, क्षोभ-शक्ति के विश्राम से परा दशा उत्पन्न होती है।