Vijñāna Bhairava Tantra · 1.145

Vijñāna Bhairava Tantra 1.145

1.145
जलस्येवोर्मयो वह्नेर्ज्वालाभङ्ग्यः प्रभा रवेः । ममैव भैरवस्यैता विश्वभङ्ग्यो विभेदिताः ॥१४५॥
jalasyevormayo vahner jvālābhaṅgyaḥ prabhā raveḥ | mamaiva bhairavasyaitā viśvabhaṅgyo vibheditāḥ
anuṣṭubh
— लहरें (कर्ता कारक बहुवचन) ; — ज्वाला की लपटें (कर्ता बहुवचन — समासगत) ; — विश्व-तरंगें, विश्व के नाना भेद-रूप (कर्ता बहुवचन — समासगत)

[पुनरुक्ति — श्लोक ९३] जैसे जल की लहरें, अग्नि की ज्वालाएँ, सूर्य की प्रभा — वैसे ही ये (दीखती) विश्व-तरंगें मुझ भैरव की ही (अभिन्न) हैं, (केवल) विभिन्न दीखती हैं।