जलस्येवोर्मयो वह्नेर्ज्वालाभङ्ग्यः प्रभा रवेः ।
ममैव भैरवस्यैता विश्वभङ्ग्यो विभेदिताः ॥१४५॥
jalasyevormayo vahner jvālābhaṅgyaḥ prabhā raveḥ |
mamaiva bhairavasyaitā viśvabhaṅgyo vibheditāḥ
anuṣṭubh
[पुनरुक्ति — श्लोक ९३] जैसे जल की लहरें, अग्नि की ज्वालाएँ, सूर्य की प्रभा — वैसे ही ये (दीखती) विश्व-तरंगें मुझ भैरव की ही (अभिन्न) हैं, (केवल) विभिन्न दीखती हैं।