The Essence of the Tantra· 6.50 / 82

The Essence of the Tantra6.50

6.50

सदाशिवः स्वकालपरिक्षये बिन्द्वर्धचन्द्रनिरोधिका आक्रम्य नादे लीयते नादः शक्तितत्त्वे तत् व्यापिन्यां सा च अनाश्रिते

Transliteration (IAST)

sadāśivaḥ svakālaparikṣaye bindvardhacandranirodhikā ākramya nāde līyate nādaḥ śaktitattve tat vyāpinyāṃ sā ca anāśrite

— सदाशिव ; — अपने काल के परिक्षय पर ; — बिन्दु, अर्धचन्द्र, निरोधिका को ; — आक्रान्त कर के (पार कर के) ; — नाद में (नादात्मक अनुनाद में) ; — लीन होता है ; — शक्ति-तत्त्व में ; — व्यापिनी में (सर्वव्यापी में) ; — अनाश्रित में (आश्रय-रहित में)

सदाशिव अपने काल के परिक्षय पर बिन्दु, अर्धचन्द्र, निरोधिका को आक्रान्त कर के (पार कर के) नाद में लीन हो जाता है; नाद शक्ति-तत्त्व में, वह व्यापिनी में, और वह अनाश्रित में (लीन होती है)।