The Essence of the Tantra· 22.5 / 53

The Essence of the Tantra22.5

22.5

तद् अनया स्थित्या कुलयागः स च षोढा बाह्ये शक्तौ स्वदेहे यामले प्राणे संविदि च इति

Transliteration (IAST)

tad anayā sthityā kulayāgaḥ sa ca ṣoḍhā bāhye śaktau svadehe yāmale prāṇe saṃvidi ca iti

— इस (समुचित) स्थिति से ; — कुल-याग ; — छह प्रकार का ; — बाह्य (स्थण्डिल) में ; — शक्ति में ; — अपने देह में ; — यामल (युगल) में ; — प्राण में ; — संवित् में

अतः इस स्थिति से कुल-याग (किया जाता है); और वह छह प्रकार का है — बाह्य (स्थण्डिल) में, शक्ति में, अपने देह में, यामल में, प्राण में एवं संवित् में — इस प्रकार।