The Essence of the Tantra· 22.4 / 53

The Essence of the Tantra22.4

22.4

द्वये ऽपि नरके घोरे तस्माद् एनां स्थितिं भजेत्

Transliteration (IAST)

dvaye 'pi narake ghore tasmād enāṃ sthitiṃ bhajet

— दोनों ही (पक्षों) में ; — घोर नरक में ; — इस (समुचित) स्थिति का ; — आश्रय ले

दोनों ही (पक्ष) घोर नरक में (पड़ते हैं); अतः इस (समुचित) स्थिति का आश्रय ले।