The Essence of the Tantra· 22.13 / 53

The Essence of the Tantra22.13

22.13

ततो गन्धधूपासवकुसुमादीन् आत्मप्रह्वीभावान्तान् अर्पयित्वा स्वविश्रान्त्या जप्त्वा उपसंहृत्य जले निक्षिपेत्

Transliteration (IAST)

tato gandhadhūpāsavakusumādīn ātmaprahvībhāvāntān arpayitvā svaviśrāntyā japtvā upasaṃhṛtya jale nikṣipet

— गन्ध, धूप, आसव, कुसुम आदि ; — आत्म-प्रह्वीभाव (आत्म-समर्पण) पर्यन्त ; — अर्पित करके ; — अपनी विश्रान्ति से जप करके ; — उपसंहार करके ; — जल में डाल दे

तदनन्तर गन्ध, धूप, आसव, कुसुम आदि से लेकर आत्म-प्रह्वीभाव (आत्म-समर्पण) पर्यन्त (वस्तुओं को) अर्पित करके, अपनी विश्रान्ति से जप करके, उपसंहार करके (उसे) जल में डाल दे।