The Essence of the Tantra· 22.1 / 53

The Essence of the Tantra22.1

22.1

अथ समस्ता इयम् उपासा समुन्मिषत्तादृशदृढवासनारूढान् अधिकारिणः प्रति श्रीमत्कौलिकप्रक्रियया निरूप्यते तत्र उक्तं योगसञ्चारादौ आनन्दं ब्रह्म तद्देहे त्रिधौष्ट्यान्त्यव्यवस्थितम्

Transliteration (IAST)

atha samastā iyam upāsā samunmiṣattādṛśadṛḍhavāsanārūḍhān adhikāriṇaḥ prati śrīmatkaulikaprakriyayā nirūpyate tatra uktaṃ yogasañcārādau ānandaṃ brahma taddehe tridhauṣṭyāntyavyavasthitam

— यह समस्त उपासना ; — उन्मिषित होती हुई वैसी दृढ वासना में रूढ़ ; — अधिकारियों के प्रति ; — श्रीमत् कौलिक प्रक्रिया से ; — निरूपित की जाती है ; — योगसञ्चार आदि (शास्त्रों) में ; — आनन्द ब्रह्म है ; — उस देह में ; — त्रिधा (तीन प्रकार से), ओष्ठ-पर्यन्त व्यवस्थित

अब यह समस्त उपासना, उन्मिषित होती हुई वैसी दृढ वासना में रूढ़ अधिकारियों के प्रति, श्रीमत् कौलिक प्रक्रिया से निरूपित की जाती है। वहाँ योगसञ्चार आदि में कहा गया है — 'आनन्द ब्रह्म है, जो उस देह में त्रिधा (तीन प्रकार से) ओष्ठ-पर्यन्त व्यवस्थित है।'