The Essence of the Tantra· 16.20 / 24

The Essence of the Tantra16.20

16.20

जीवतो ऽपि परोक्षस्य उत्पन्ने शक्तिपाते ऽयम् एव क्रमः दार्भाकृतिकल्पनजीवाकृष्टिवर्जम्

Transliteration (IAST)

jīvato 'pi parokṣasya utpanne śaktipāte 'yam eva kramaḥ dārbhākṛtikalpanajīvākṛṣṭivarjam

— जीवित किन्तु ; — परोक्ष (अनुपस्थित, दूरस्थ) के ; — शक्तिपात उत्पन्न होने पर ; — यही क्रम (प्रक्रिया) ; — दार्भ-आकृति की कल्पना तथा जीव-आकृष्टि को छोड़कर

जीवित किन्तु परोक्ष (अनुपस्थित) के विषय में भी, शक्तिपात उत्पन्न होने पर, यही क्रम (है) — दार्भ-आकृति की कल्पना तथा जीव-आकृष्टि को छोड़कर।