The Vision of Śiva· 7.96 / 122

The Vision of Śiva7.96

7.96
भुञ्जेऽहं यत्र तत्रापि भोगलग्नः प्रतीतितः । शिवोऽस्मि साधनाविष्टः शिवोऽहं याजकोऽप्यहम् ॥९६॥
bhuñje'haṃ yatra tatrāpi bhogalagnaḥ pratītitaḥ | śivo'smi sādhanāviṣṭaḥ śivo'haṃ yājako'pyaham
— मैं भोग करता हूँ ; — जहाँ-कहीं भी ; — भोग में लग्न (तल्लीन) ; — प्रतीति (निश्चय) के द्वारा ; — 'मैं शिव हूँ' ; — साधन से आविष्ट ; — 'मैं शिव हूँ' ; — 'मैं याजक भी हूँ'

मैं जहाँ-कहीं भी (हो) भोग करता हूँ, प्रतीति (निश्चय) के द्वारा भोग में लग्न (तल्लीन) होकर: 'मैं शिव हूँ, साधन से आविष्ट हूँ; मैं शिव हूँ, और मैं ही याजक (यज्ञ करने वाला) भी हूँ।'