किमेतेनात्मभावेन तृप्त्या वा परपूजनम् ।
सर्वाकारेषु भोग्येन यजनं मम वर्तते ॥९५॥
kimetenātmabhāvena tṛptyā vā parapūjanam |
sarvākāreṣu bhogyena yajanaṃ mama vartate
इस आत्म-भाव (आत्म-तादात्म्य) से अथवा (इस) तृप्ति से किसी (कल्पित) पर (अन्य) के पूजन का क्या (प्रयोजन)? (बल्कि) समस्त आकारों में भोग्य (भोगनीय वस्तु) के रूप में मेरा यजन (पूजन निरन्तर) चलता रहता है।