The Vision of Śiva· 7.95 / 122

The Vision of Śiva7.95

7.95
किमेतेनात्मभावेन तृप्त्या वा परपूजनम् । सर्वाकारेषु भोग्येन यजनं मम वर्तते ॥९५॥
kimetenātmabhāvena tṛptyā vā parapūjanam | sarvākāreṣu bhogyena yajanaṃ mama vartate
— इस से क्या (प्रयोजन) ; — आत्म-भाव से ; — अथवा तृप्ति से ; — पर (अन्य) का पूजन ; — समस्त आकारों में ; — भोग्य के रूप में ; — यजन (पूजन) ; — मेरा ; — चलता रहता है

इस आत्म-भाव (आत्म-तादात्म्य) से अथवा (इस) तृप्ति से किसी (कल्पित) पर (अन्य) के पूजन का क्या (प्रयोजन)? (बल्कि) समस्त आकारों में भोग्य (भोगनीय वस्तु) के रूप में मेरा यजन (पूजन निरन्तर) चलता रहता है।