The Vision of Śiva· 7.97 / 122

The Vision of Śiva7.97

7.97
शिव एवानया स्थित्या सत्यया याग उत्तमः । येन येन यत्र यत्र यैर्यैर्यदिह चेज्यते ॥९७॥
śiva evānayā sthityā satyayā yāga uttamaḥ | yena yena yatra yatra yairyairyadiha cejyate
— शिव ही ; — इस स्थिति (दृष्टिकोण) के द्वारा ; — सत्य ; — उत्तम याग ; — जिस-जिस (साधन) से ; — जहाँ-जहाँ ; — जिन-जिन (उपकरणों) से ; — जो कुछ ; — यहाँ ; — और ; — यज्ञ में अर्पित किया जाता है

इस सत्य (वास्तविक) स्थिति (दृष्टिकोण) के द्वारा शिव ही उत्तम याग (यज्ञ) है; जिस-जिस (साधन) से, जहाँ-जहाँ, जिन-जिन (उपकरणों) से, जो कुछ यहाँ यज्ञ में अर्पित किया जाता है (— वह सब शिव ही है, जैसा अगली कारिका कहती है)।