सामर्थ्यं यदि कल्प्येत तन्नामानन्त्यमेव वा ॥४॥
sāmarthyaṃ yadi kalpyeta tannāmānantyameva vā
यदि (शिव का) सामर्थ्य (उससे भिन्न) कल्पित किया जाए, तो निश्चय ही (आगे-आगे सामर्थ्यों का) अनन्त्य (अनवस्था) ही (आ पड़ेगा)।
यदि (शिव का) सामर्थ्य (उससे भिन्न) कल्पित किया जाए, तो निश्चय ही (आगे-आगे सामर्थ्यों का) अनन्त्य (अनवस्था) ही (आ पड़ेगा)।