सर्वतःक्रमसंहारमात्रमाकारवर्जितम् ।
ब्रह्मतत्त्वं परा काष्ठा परमार्थस्तदेव सः ॥५॥
sarvataḥkramasaṃhāramātramākāravarjitam |
brahmatattvaṃ parā kāṣṭhā paramārthastadeva saḥ
सब ओर से क्रम का संहार-मात्र, आकार से रहित — वही ब्रह्म-तत्त्व है, परा काष्ठा (चरम सीमा) है, परमार्थ है; वही वह (उनके मत में) है।