Verses on the Recognition of the Lord· 2.3 / 11

Verses on the Recognition of the Lord2.3

2.3
अथानुभवविध्वंसे स्मृतिस् तदनुरोधिनी कथं भवेन् न नित्यः स्याद् आत्मा यद्य् अनुभावकः ॥३॥
athānubhavavidhvaṃse smṛtis tadanurodhinī kathaṃ bhaven na nityaḥ syād ātmā yady anubhāvakaḥ
— अब, यदि (आक्षेप किया जाए) ; — अनुभव के नष्ट हो जाने पर ; — स्मृति ; — उस (अनुभव) के अनुरूप ; — कैसे? ; — उत्पन्न हो (विधि, √भू) ; — नहीं ; — नित्य ; — हो (विधि, √अस्) ; — आत्मा ; — यदि ; — अनुभव करने वाला, अनुभोक्ता

(आक्षेप:) अब, मूल अनुभव के नष्ट हो जाने पर, उसके अनुरूप स्मृति कैसे उत्पन्न हो सकती है, यदि अनुभव करने वाला आत्मा नित्य न हो?