Verses on the Recognition of the Lord· 11.15 / 17

Verses on the Recognition of the Lord11.15

11.15
विश्ववैचित्र्यचित्रस्य समभित्तितलोपमे विरुद्धाभावसंस्पर्शे परमार्थसतीश्वरे ॥१५॥
viśvavaicitryacitrasya samabhittitalopame viruddhābhāvasaṃsparśe paramārthasatīśvare
— विश्व की विचित्रता रूपी चित्र के (लिए) ; — समतल भित्ति-तल के समान ; — विरुद्ध या अभाव के स्पर्श से रहित ; — परमार्थतः सत् (वास्तविक रूप से विद्यमान) ; — ईश्वर में

जब ईश्वर — परमार्थतः सत् (वास्तविक), किसी विरुद्ध अथवा अभाव के स्पर्श से रहित, विश्व की विचित्रता रूपी चित्र के लिए समतल भित्ति के समान —