Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 8.22 / 28

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)8.22

8.22
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया । यं प्राप्य न पुनर्जन्म लभन्ते योगिनोऽर्जुन ॥ ८-२२ ॥
puruṣaḥ sa paraḥ pārtha bhaktyā labhyastvananyayā | yaṃ prāpya na punarjanma labhante yogino'rjuna || 8-22 ||
— वह परम पुरुष, हे पार्थ ; — अनन्य भक्ति से ही प्राप्य ; — जिसे प्राप्त करके पुनर्जन्म ; — योगी नहीं पाते, हे अर्जुन

हे पार्थ, वह परम पुरुष अनन्य भक्ति से ही प्राप्य है; हे अर्जुन, जिसे प्राप्त करके योगी फिर पुनर्जन्म को नहीं पाते।