Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 8.21 / 28

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)8.21

8.21
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ ८-२१ ॥
avyakto'kṣara ityuktastamāhuḥ paramāṃ gatim | yaṃ prāpya na nivartante taddhāma paramaṃ mama || 8-21 ||
— अव्यक्त, अक्षर ऐसा कहा गया ; — उसे परम गति कहते हैं ; — जिसे प्राप्त करके लौटते नहीं ; — वह मेरा परम धाम

जो अव्यक्त और अक्षर कहा गया है, उसे ही परम गति कहते हैं; जिसे प्राप्त करके (मनुष्य) लौटते नहीं — वह मेरा परम धाम है।